रोज़ in Yasni Exposé of Kavi Deepak Sharma

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Birth name: Deepak Sharma, Nickname: Kavi Deepak Sharma, Country: India, Language: English
I offer: Hindi urdu Kavita, Hindi films, Cinema, Geetkar, Hindi film Lyrics, Kavi Deepak Sharma, Mushaira, Nazam, India, Kavi Sammelan, Hindi Poet, Ghazal, Hindi Filmy Geet and Gaane
Kavi Deepak Sharma @ Al malki Group of Companies, Vaishali,Ghaziabad,INDIA

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Kavi Deepak Sharma @ Vaishali,Ghaziabad,INDIA
Dec 09  +
Kavi Deepak Sharma @ Vaishali,Ghaziabad,INDIA
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9 results for Kavi Deepak Sharma

ek vandana-------Kavi Deepak Sharma

बुद्धम शरणं गच्छामि................ दो पल सुख से सोना चाहे पर नींद नही पल को आए जी मचले हैं बेचैनी से ,रूह ना जाने क्यों अकुलाए ज्वाला सी जलती हैं तन मे ,उम्मीद हो रही हंगामी ..... बुद्धम शरणं गच्छामि................ मन कहता हैं सब छोड़ दूँ मैं पर कैसे छुटेगा यह लालच रोज़ बदता जाता हैं ,लगती दरिया सी तपती रेत एक पूरी होती एक अभिलाषा ,खुद पैदा हो जाती आगामी...... बुद्धम शरणं गच्छामि................ नयनो मे शूल से चुभते हैं, सपने जो अब तक कुवारें हैं कण से छोटा हैं ये जीवन और कर थामे सागर हमारे हैं पागल सी घूमती रहती इस चाहत मे जिन्दगी बे-नामी........ बुद्धम शरणं गच्छामि................ ईश्वर हर लो मन से सारी, मोह माया जैसी बीमारी लालच को दे दो एक कफ़न ,ईर्ष्या को बेबा की साडी मैं चाहूँ बस मानव बनना ,मांगू कंठी हरि नामी .... बुद्धम शरणं गच्छामि................ @कवि दीपक शर्मा http://www.kavideepaksharma.co.in http://k avideepaksharma.blogspot.com http://kavyadha ra-team.blogspot.com
Kavi Deepak Sharma @ Vaishali,Ghaziabad,INDIA
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yasni 2009-12-31  +  

Kavi Deepak Sharma ki ek Kavita........"जाती है दृष्टि जहाँ तक बादल धुएँ के देखता हूँ

"जाती है दृष्टि जहाँ तक बादल धुएँ के देखता हूँ अर्चना के दीप से ही मन्दिर जलते देखता हूँ । देखता हूँ रात्रि से भी ज्यादा काली भोर को आदमी की मूकता को गोलियों के शोर को देखता हूँ नम्रता जकडे हिंसा की जंजीर है आख़िर यकीं कैसे करूँ यह हिंद की तस्वीर है । कितने बचपन दोष अपना बेबस नज़र से पूछते है बेघर अनाथ होने का कारन खंडर से घर पूछते हैं टूटे कुंवारे कंगन अपना पूछते कसूर क्या है सूनी कलाई पूछती है आख़िर हमने क्या किया है सप्तवर्णी चुनरियों के तार रोकर बोलते है स्वप्न हर अनछुआ मन की बन गया पीर है ॥ नोंक पर तूफ़ान की शमा को लुटते देखता हूँ रोज़ कितनी रोशनी को खुदकुशी करते देखता हूँ देखता हूँ कुछ सुमन की ही बगावत चमन से श्वास का ही विद्रोह लहू , हृदय और तन से । लगता है सरिताएं भी हीनता से सूख रहीं क्योंकि हर हृदय समंदर आँख बनी क्षीर है ॥ हर हृदय की आस होती लौटकर न अतीत लाये वर्तमान से भी ज्यादा उसका भविष्य मुस्कुराये लेकिन प्रभु से प्रार्थना ,भविष्य देश का अतीत हो कुछ नहीं तो "दीपक" ह्रदय मे निष्कपट प्रीति हो क्योंकि नफरत की कैंची है जिस तरह चल रही डरता हूँ कहीं थान सारा बन न जाए चीर है Kavi Deepak Sharma http://www.kavideepaksharma.com
Kavi Deepak Sharma @ Vaishali,Ghaziabad,INDIA
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yasni 2009-12-31  +  

One of the best nazm of Kavi Deepak Sharma

जिस रोज़ हर पेट को रोटी मिल जायेगी जिस रोज़ हर चेहरा हँसता नज़र आयेगा जिस रोज़ नंगे बदन कपड़ों से ढके होंगे जिस रोज़ खुशियों में वतन डूब जायेगा उस रोज़ मेरे नग्मों का अंदाज़ देखना मेरी आवाज़ में एक नई आवाज़ देखना . जिस रोज़ किसानो के भरे खलियान होंगे और रोज़गारशुदा वतन के नौजवान होंगे जिस रोज़ पसीने की सही कीमत मिलेगी इन महलों से बड़े जिस रोज़ इन्सान होंगे उस रोज़ मेरे नग्मों का अंदाज़ देखना मेरी आवाज़ में एक नई आवाज़ देखना जिस रोज़ राह में कोई अबला न लुटेगी जिस रोज़ दौलत से कोई जान न मिटेगी जिस रोज़ यहाँ जिस्म के बाज़ार न लगेंगे जिस रोज़ डोली दर से कोई सूनी न उठेगी उस रोज़ मेरे नग्मों का अंदाज़ देखना मेरी आवाज़ में एक नई आवाज़ देखना . ये हाथ पसारे मासूम बचपन हजारों जिस रोज़ मुझे राह में घूमते न दिखेंगे जिस रोज़ ज़र्द, पिचके वीरान चेहरों पे भूख के नाचते - गाते बादल न दिखेंगे उस रोज़ मेरे नग्मों का अंदाज़ देखना मेरी आवाज़ में एक नई आवाज़ देखना . @Kavi Deepak Sharma http://www.kavideepaksharma.com
Kavi Deepak Sharma @ Vaishali,Ghaziabad,INDIA
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yasni 2009-12-31  +  

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