बेबस in Yasni Exposé of Kavi Deepak Sharma

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Birth name: Deepak Sharma, Nickname: Kavi Deepak Sharma, Country: India, Language: English
I offer: Hindi urdu Kavita, Hindi films, Cinema, Geetkar, Hindi film Lyrics, Kavi Deepak Sharma, Mushaira, Nazam, India, Kavi Sammelan, Hindi Poet, Ghazal, Hindi Filmy Geet and Gaane
Kavi Deepak Sharma @ Al malki Group of Companies, Vaishali,Ghaziabad,INDIA

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Kavi Deepak Sharma @ Vaishali,Ghaziabad,INDIA
Dec 09  +
Kavi Deepak Sharma @ Vaishali,Ghaziabad,INDIA
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9 results for Kavi Deepak Sharma

Kavi Deepak Sharma ki ek aur dilqash nazm

गगन को चूमते ऊंचे मकान वालों सुनो बहुत दिलकश , मुन्नकश ऐवान वालों सुनो तुम्हें क्यों अपनी इमारत पे गुरुर है इसका असली मालिक तो केवल मजदूर है इनकी हकदार रोते बच्चों की निगाहें है इनकी हक़दार पत्थर तोड़ती बेबस माँऐं हैं इनके हक़दार घायल हाथ , ज़ख्मी पाँव हैं इनके हक़दार तो बहते- रिसते घाव हैं तन तुम्हारा तो ऐसी चोटों से दूर है इसका असली हक़दार तो केवल मजदूर है कितने मजदूरों ने छोड़कर बीमार बच्चों को सूरत इन महलों की अपने हाथों से संवारी है दबा कर भूख के शोले एक लोटा पानी से इनके दरवाजों पर लाजवाब नक्काशी उभारी है तुने तो सिक्कों की रौशनी फेंकी पसीने पर मगर मजदूर की मेहनत ने तराशा कोहिनूर है चमकते फर्श पर तुम जो खड़े हो इतराये से कई हाथों ने इसे प्यार से सहलाया है हर टुकडा लगाया है बहुत करीने से बड़े सलीके से दुल्हन - सा इसे सजाया है आज उनको ही नहीं इजाजत दहलीज़ चड़ने की जिनके हुनर की बदौलत ड्योढी तेरी नूर है @कवि दीपक शर्मा Poem talen from poet's book "Manzar" http://www.kavideepaksharma.co.in http://shayardeepaksharma.blogspot.com http://kavideepaksharma.blogspot.com
Kavi Deepak Sharma @ Vaishali,Ghaziabad,INDIA
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yasni 2009-12-31  +  

Kavi Deepak Sharma ki ek Kavita........"जाती है दृष्टि जहाँ तक बादल धुएँ के देखता हूँ

"जाती है दृष्टि जहाँ तक बादल धुएँ के देखता हूँ अर्चना के दीप से ही मन्दिर जलते देखता हूँ । देखता हूँ रात्रि से भी ज्यादा काली भोर को आदमी की मूकता को गोलियों के शोर को देखता हूँ नम्रता जकडे हिंसा की जंजीर है आख़िर यकीं कैसे करूँ यह हिंद की तस्वीर है । कितने बचपन दोष अपना बेबस नज़र से पूछते है बेघर अनाथ होने का कारन खंडर से घर पूछते हैं टूटे कुंवारे कंगन अपना पूछते कसूर क्या है सूनी कलाई पूछती है आख़िर हमने क्या किया है सप्तवर्णी चुनरियों के तार रोकर बोलते है स्वप्न हर अनछुआ मन की बन गया पीर है ॥ नोंक पर तूफ़ान की शमा को लुटते देखता हूँ रोज़ कितनी रोशनी को खुदकुशी करते देखता हूँ देखता हूँ कुछ सुमन की ही बगावत चमन से श्वास का ही विद्रोह लहू , हृदय और तन से । लगता है सरिताएं भी हीनता से सूख रहीं क्योंकि हर हृदय समंदर आँख बनी क्षीर है ॥ हर हृदय की आस होती लौटकर न अतीत लाये वर्तमान से भी ज्यादा उसका भविष्य मुस्कुराये लेकिन प्रभु से प्रार्थना ,भविष्य देश का अतीत हो कुछ नहीं तो "दीपक" ह्रदय मे निष्कपट प्रीति हो क्योंकि नफरत की कैंची है जिस तरह चल रही डरता हूँ कहीं थान सारा बन न जाए चीर है Kavi Deepak Sharma http://www.kavideepaksharma.com
Kavi Deepak Sharma @ Vaishali,Ghaziabad,INDIA
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yasni 2009-12-31  +  

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